सन्तान
From सर्वज्ञ
पूत सपूत त का धन संचय , पूत कपूत त का धन संचय ।
अजात्मृतमूर्खेभ्यो मृताजातौ सुतौ वरम् । यतः तौ स्वल्प दुखाय, जावज्जीवं जडो दहेत् ॥ — पंचतन्त्र ( अजात् ( जो पैदा ही नहीं हुआ ) , मृत और मूर्ख - इन तीन तरह के पुत्रों मे से अजात और मृत पुत्र अधिक श्रेष्ठ हैं , क्योंकि अजात और मृत पुत्र अल्प दुख ही देते हैं । किन्तु मूर्ख पुत्र जब तक जीवन है तब तक जलाता रहता है । )
माता शत्रुः पिता बैरी , येन बालो न पाठितः । सभामध्ये न शोभते , हंसमध्ये बको यथा ॥ जिसने बालक को नहीं पढाया वह माता शत्रु है और पिता बैरी है । (क्योंकि) सभा में वह (बालक) ऐसे ही शोभा नहीं पाता जैसे हंसों के बीच बगुला ।
दो बच्चों से खिलता उपवन । हँसते-हँसते कटता जीवन ।।
धरती पर है स्वर्ग कहां – छोटा है परिवार जहाँ.
जिस तरह एक दीपक पूरे घर का अंधेरा दूर कर देता है उसी तरह एक योग्य पुत्र सारे कुल का दरिद्र दूर कर देता है | –कहावत
