प्रेम

From सर्वज्ञ

उस मनुष्य का ठाट-बाट जिसे लोग प्यार नहीं करते, गांव के बीचोबीच उगे विषवृक्ष के समान है। - तिरुवल्लुवर

जो अकारण अनुराग होता है उसकी प्रतिक्रिया नहीं होती है क्योंकि वह तो स्नेहयुक्त सूत्र है जो प्राणियों को भीतर-ही-भीतर (ह्रदय में) सी देती है। - उत्तररामचरित

पुरुष के लिए प्रेम उसके जीवन का एक अलग अंग है पर स्त्री के लिए उसका संपूर्ण अस्तित्व है। - लार्ड बायरन

रहिमन धागा प्रेम का , मत तोड़ो चिटकाय। तोड़े से फिर ना जुड़ै , जुड़े गाँठ पड़ि जाय।। —-रहीम

पोथी पढि पढि जग मुआ , पंडित भया न कोय । ढाई अक्षर प्रेम का पढे , सो पंडित होय ॥

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