अनुगूँज १५ - हम फिल्में क्यूँ देखते हैं

शुक्ला जी ने कल प्रविष्टि क्या लिखी लोगों की नींद खुल गई। देखिए आज बंदा हाजिर है अनुगूँज के विषय के साथ। फिल्में हम सभी के जीवन का अभिन्न अंग हैं। फिल्मों के बारे में सभी की पसंद अलग अलग होती है। कुछ फिल्में टाइम-पास करने के लिए देखते हैं तो कुछ कलात्मक पहलुओं पर ज्यादा ध्यान देते हैं, कईयों के लिए तो बिना संगीत के फिल्म मायने नहीं रखती तो कई केवल नो एन्ट्री या गोविंदा टाईप फिल्में ही देखना पसंद करते हैं। ब्लैक जैसी फिल्में कईयों के दिलों को छू जाती हैं तो कईयों को कुनैन की गोली लगती हैं। मैं अपना उदाहरण लूं तो मेरी पसंद भी बदली है। कॉलेज के जमाने में नाक ऊंची करके केवल कलात्मक या कहें कि पैरलल सिनेमा की फिल्में ही पसंद करते थे। अब बात अलग है।

अक्षरग्राम वर्षगाँठयही इस अनुगूँज जो कि अब नम्बर १५ पर पहुंच चुकी है का विषय है। तो लिख डालिए अपने फिल्में देखने के कारण। आप देखते हैं तो क्या देखते हैं क्यों देखतें है और क्या चीज न हो तो आपको फिल्म, फिल्म नहीं लगती। नियम यहाँ सर्वज्ञ पर हैं। अपनी प्रविष्टि ३० नवम्बर से पहले प्रकाशित कर दें।

चलते चलते सभी को याद दिलाना चाहुंगा कि आजकल सर्वज्ञ सुंदर करो सप्ताह चल रहा है। देबाशीष व अनुनाद जी अपने विचार बता चुकें हैं आप के विचारों का भी इतंजार है जरा यहाँ जाकर बताएं कि हम सर्वज्ञ में कैसे सुधार कर सकते हैं।

अपडेट - देबाशीष जी ने ईमेल द्मारा बताया कि अनुगूँज का पहला आयोजन किए हुए एक वर्ष पूरा हो गया है। अनूगूंज का शंखनाद हुआ था पहली नवम्बर को धीर गंभीर विषय क्या देह ही है सब कुछ?” के साथ। इसलिए यह आयोजन अनुगूँज का वर्षगाँठ विशेष के रूप में आयोजित किया जा रहा है। बढ़चढ़ कर भाग लीजिए। एक और बात इस बार चुनाव द्मारा पहली चुनी गई प्रविष्टि को नवनीत बख्शी जी की लिखी गई मैं भी बना मिनिस्टर की प्रति पुरुस्कार स्वरुप भैजी जाएगी। देबाशीष व जीतेन्द्र जी को इसके लिए धन्यवाद। कृप्या नोट करें पुस्तक केवल भारत में ही डाक द्मारा भेजी जा सकती है।

छवि साभार - इंद्राणी

23 Responses to “अनुगूँज १५ - हम फिल्में क्यूँ देखते हैं”

  1. लो भैया, हमने गूगल भैया को भी बता दिया है

    http://base.google.com/base/search?q=Hindi&btnG=Search+Base&nd=0&scoring=r&us=0

    अब पूरी दुनिया भाग ले सकती है इस प्रतियोगिता में।

  2. ये लिजीये हमने तो बता दिया कि हम फिल्मे क्यों देखते है

    आशीष श्रीवास्तव

  3. varshgath ki entry likhni to jaroor hogi…lekin bhai logo apni entry “kaafi der se” aayegi (dhyan diya jaay humne ‘jara’ shabd ka istmaal nahi kiya), Jara vatan tak daur laga ke aate hain. Is saal ki haaziri nahi lagayi na.

  4. यह मेरी पेल हम फ़िल्में क्यों देखते हैं

  5. बहुत दिनों बाद अनुगूँज के विषय ने लिखने के लिए आकर्षित किया है. पर इस टिप्पड़ीं के स्थान से लिंक कैसे दिखायी जाये, यह समझ नहीं आया. सुनील

    अपडेट - सुनील जी आपकी प्रविष्टि की कड़ी मैं यहाँ डाल रहा हूँ - मिर्ची सेठ 

  6. लीजिए मिर्ची सेठ के मन की भी जान लें कि हम फिल्में क्यों देखते हैं?

  7. […] फिल्में देखने का शगल अंतर्राष्ट्रीय है। दुनिया में हर जगह फिल्में देखी जाती हैं। वहाँ भी जहां की फिल्म इंडस्ट्री अपने चरम पर है और वहां भी जहाँ फिल्में नहीं के बराबर बनती हैं। लेकिन एक बात पक्की है हर जगह फिल्मों के लिए लोगों का जज्बा बहुत भंयकर है। लोगो को फिल्मों के बारे में बात करनें में भी बहुत मजा आता है। जरा ब्लॉगजगत में देखिए कितने ही ब्लॉग इसकी गाथा गाते मिलेंगे। चाहे रमण जी की नपी तुली समीक्षाएं हो या फिर स्वामी जी की भभकती भाप वाली, आप फिल्मों के बारें मे पढ़ता पाएंगे और जब कभी भी मेटरिक्स जैसी फिल्में आती हैं तो अंतर्जाल उस की कहानियां से अटा पाया जाता है तो यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि हम फिल्में देखते क्यों है? वैसे देखा जाए तो फिल्म, पुराने जमाने के कथा वाचन व बाद में नौटंकी का ही परिष्कृत रुप है। कथा या कहानी सुनाना श्रोताओं को सपनों की दुनिया में ले जाने के बराबर ही है। सफल कथा भी वही होती है जिसमें रस आए। सामान्य तौर पर कह सकते हैं कि आदमी की पलायनवादी प्रवृत्ति से इसका जन्म होता है। आदमी कुछ समय के लिए अपने आस पास का सब कुछ भूलकर चंद लम्हे फंतासी की दुनिया में बिताना चाहता है। अब यह दुनिया चंद्रकांता की तरह मायावी भी हो सकती है या फिर ब्लैक की तरह क्रूर सत्य। यही कारण है कि एक वर्ग शतरंज के खिलाड़ी, कम्पनी, शिंडलर्स लिस्ट जैसी फिल्में पसंद करता है वहीं दूसरी और आप देखेंगे की लोग गोविंदा स्टाईल हल्की फुल्की हास्य व्यगंय वाली फिल्में देखना चाहते हैं। मर्जी सभी की अपनी अपनी है। पर यह गलत होगा कि एक वर्ग कहे कि हल्की फुलकी व्यंग्य फिल्में देखने वाले व्यक्ति बेकार हैं या फिर सीरियस फिल्में देखने वालों के बारे में कहें कि ये लोग तो सिरफिरे हैं। हम सभी पलायनवाद के चलते ही फिल्में देखते हैं। रंगीले पर्दे की कृत्रिम दुनिया में कहानी देखते वक्त आनंद आता है। अब यह हंसी का हो या वीर रस, करुणा या रहस्य का होता तो रस ही है। कई बार तो कुछ फिल्में आती हैं जो कि फिल्मकार केवल अपनी कला की अभिव्यक्ति के लिए बनाते हैं। पैरलल सिनेमा कुछ कुछ इसी वजह से ही है। ये बात और है कि ऐसे फिल्मकारों को चाहने वाले भी मिल जाते हैं। इस लिए फिल्म के बारे में समीक्षा देने से पहले यह भी देखना चाहिए कि कथाकार ने फिल्म किस के लिए बनाई थी। अब यश चौपड़ा जी की फैक्टरी में, उनकी नजरों में जो आदर्श परिवार, रिश्ते, बंधन होते हैं उसी के ऊपर फिल्में बनती हैं जिसे की जनता खूब दिल लगा कर देखती है। ये जनता को सपने दिखाने वाली बात है और जनता भी जानती है पर दिल के बहलाने को गालिब ये ख्याल अच्छा है वाली बात है। वहीं राम गोपाल वर्मा ने कसम खा रखी है कि वे जनता को हर फिल्म से एक नई कहानी सुनाएगें व इसी पर एक्सपेरीमेंट करते रहते हैं। […]

  8. हम फिल्में क्यों देखते हैं - अनुगूँज १५

    फिल्में देखने का शगल अंतर्राष्ट्रीय है। दुनिया में हर जगह फिल्में देखी जाती हैं। वहाँ भी जहां क…

  9. लो भैया हमने तो अपना लेख लिख डाला।
    http://www.jitu.info/merapanna/?p=465

    अब बकिया का “हमको कुछ नही पता”

  10. एक नज़र इधर भी…..

  11. प्रिय पंकज जी,

    हमारी राय यहाँ है।

    -राजेश
    (सुमात्रा)

  12. अनुगूँ होती रहे | मेरी प्रविष्टि भी आ गयी है |

  13. … और मेरी प्रविष्टि का पता है :

    http://pratibhaas.blogspot.com/2005/11/blog-post_26.html

  14. http://www.livejournal.com/users/alok/8303.html

  15. हम भी लिखते है सेठ, यह रही लिन्क. लेख लेना. फिर बोलेगा समय रहते बताया नहीं. क्या?
    http://www.chhavi.co.in/blog/2005/11/15.html

  16. हर तरह से पसंद हैं फिल्में

    फिल्में क्यों देखता हूँ? मुझे अच्छा लगता है। हम सभी आक्सीजन, जल और हवा पर जीते हैं पर मन की खुराक कुछ और ही होती है। फिल्में मुझे भाती हैं। जब कभी मन खराब होता है तो यह मुझे गुदगुदाकर हंसा देती है, जब…

  17. भइया पंकज, देरी के लिए क्षमा प्रार्थी हूं. अनुगूंज में पहली बार शिरकत कर रहा हूं इसलिए घबराहट हो रही थी. खैर 15वीं अनुगूंज की गाड़ी के प्लेटफार्म छोड़ने से पहले इस पर सवार हो गया हूं. अब देखते हैं अपना टिकट सही भी है या फिर चालान काटकर मुझे गाड़ी से उतार दिया जायेगा.
    अनुगूंज का हमारा टिकट यहां चेक करें.

  18. […] भई चित्त प्रसन्न है हालांकि मिडवेस्ट के मौसम ने पूरा जोर लगा रखा है डिप्रैश्न में धकेलने का। बर्फ पड़ रही है, मानोशी जी की फोटू से आपको अंदाजा भी हो जाएगा। बोझिल स्लेटी वातावरण में चिकग बंधुओं के उत्साह ने मन में लोहड़ी की आग के पास बैठी गर्माहट पैदा कर रखी है। वैसे भी यह अनुगूँज वर्षगाँठ विशेष है इसलिए और भी अच्छा है। हाँ जी तो आप भी उत्सुक होंगे इस अवलोकनी प्रविष्टि को पढ़ने के लिए और एक बात यह पहली प्रविष्टि है जो बादलों के बीच से लिख रहा हूँ। इसलिए हाजिर है पंदहरवी अनुगूंज की दास्तां मिर्ची सेठ के कीबोर्ड से बादलों की बीच अमरीका वेस्ट का जिंजर ऐल पीते हुए। […]

  19. […] फिल्में क्यों देखता हूँ? मुझे अच्छा लगता है। हम सभी आक्सीजन, जल और हवा पर जीते हैं पर मन की खुराक कुछ और ही होती है। फिल्में मुझे भाती हैं। जब कभी मन खराब होता है तो यह मुझे गुदगुदाकर हंसा देती है, जब अकेला होता हूँ तो मेरा साथ देती हैं, जब परिवार और मित्र साथ होते हैं तो बढ़िया दोस्त बन जाती है। आजकल तो खैर सिनेमा हॉल जाकर फिल्म देखना मुश्किल होता है तो टीवी या कंप्यूटर ही माध्यम बने हैं सिनेमा दर्शन के। मैंने अक्सर यह सोचा है कि मुझे किस तरह की फिल्में पसंद हैं पर सचाई यही लगती है कि स्थितिजन्य कारणों से कोई फिल्म पसंद आती है और कोई नहीं, कई बार उद्देश्यपूर्ण सिनेमा पसंद आ जाता है तो कई बार बेसिरपैर का धमाल भा जाता है। शायद इसीलिये सलाम नमस्ते पसंद आई पर जेम्स नहीं, सत्या अच्छी लगी पर सेहर नहीं। […]

  20. Good site, nice design! Please also visit my site:

  21. Really nice and interesting website. Thank you a lot! Please visit my site too:

  22. Yo! Cool stuff! Thanks for being here. Please visit my site too:

  23. Really nice and interesting website. Thank you a lot! Visit my sites, please:

Leave a Reply