पाँचवी अनुगूँजः पहला प्यार

जब मैने इस विषय को चुना तो मेरे को पता था, लिखने वाले, कतरायेंगे…फिर भी मैने सोचा था कि गंभीर विषयो पर लिख लिख कर लोगबाग थक गये होंगे, इसलिये कुछ हल्का विषय दूँ, जो जीवन के बहुत करीब हो.चलिये हाजरीन ओ हजरात महफिल का आगाज करते है इस शेर से…..
“उस को जुदा हुए भी जमाना बहुत हुआ,
अब क्या कहैं कि ये किस्सा पुराना बहुत हुआ
हम खुल्द से निकल तो गये है पर ए खुदा,
इतने से वाक्ये का फसाना बहुत हुआ
-अहमद फराज
इस महफिल की पहली शमा जलाई हमारे तत्काल एकसप्रेस के विजय ठाकुर ने , वे अपने साथ पटुष के फल लेकर आये. बचपन की अठखेलिया करता, सौंधी सौँधी खुशबू लिये एक मासूम सा प्यार.अपनी प्रेयसी का नाम ये छुपा गये तो बेचारे हिटलर को अपनी कब्र मे से उठकर, इस प्रेम प्रसंग के बीच मे अपना नाम देने के लिये आना पड़ा.जरा नजर डालिये…
“मुझे मीठे पुटुष पसंद थे तो उसे थोड़ी सी खटास वाली। पुटुष तोड़ तोड़कर हम चखा करते, अगर अपने मुताबिक स्वाद हुई तो खा लिये नहीं तो आधी खाई पुटुष या तो हिटलर मेरी जेब के हवाले करती या फिर मैं उसके फ्राक को मोड़ कर बनाये गये झोलेनुमा आकृति को। मेरी खाने की वैसे एक सीमा थी लेकिन वो जब खाती थी आध किलो से कम खाये बिना उसका जी न मानता, अब उसकी हिटलरी सजा मुझे मिलती कि उसका टिफिन मुझे खाना पड़ता था। अपना टिफिन, फिर पुटुष और फिर वो हिटलरी टिफिन खाकर कक्षा में आने के बाद उधर गुरुजी पढा रहे होते और मैं स्वपनलोक में विचर रहा होता।”
ठाकुर साहब ने पहले प्यार के लिये काफी बलिदान भी दिये थे,मास्साब से पिटे भी,स्कूल भी छोड़ना पड़ा.कहानी यंही पर खत्म नही होती है, क्लाइमेक्स अभी बाकी है
शायद आगाज हुआ फिर किसी अफसानें का
हुक्म आदम को है जन्नत से निकल जाने का
“उसके बाद उससे मुलाकात सीधे इंटर पास करने के बाद अपनी कालोनी में काली पूजा के दौरान लगने वाले मेले में हुई। अपने नये नवेले दूल्हे के साथ थी और साथ में एक छोटा बच्चा भी, शायद एक साल से कुछ कम का होगा। उसने पति से मिलवाया…… दस मिनट की संक्षिप्त मुलाक़ात के बाद जब साहिबा जाने लगी तो मैं भी नमस्ते कर जाने को मुड़ा लेकिन उसका एक वाक्य सुनकर मेरे कदम अपने आप पीछे मुड़ गये साहिबा अपने पति से कह रही थी “पुटुष को आप गोद ले लीजिये”। मेरे कदम तो पीछे मुड़े लेकिन साहिबा बिना मुड़े जाती रही।”
यानि कि हिटलर ने ठाकुर साहब की याद ताजा रखी….मतलब कि इनको अमर कर दिया अपने जीवन मे…..बहुत अच्छा लेख लिखे है, जरूर पढियेगा.
इसके बाद बारी थी अपने आशीष भाई के चिट्ठे की…आशीष भाई इस कहानी मे काफी कुछ छिपा गये…इनको पसन्द आयी तमिलनाडू की सुन्दरी, जो इनसे एक साल जूनियर थी, जब तक बात कुछ आगे बढती, यानि कि आशीष भाई तमिल सीखते या अंग्रेजी मे चिट्ठी लिखवाते इनका बीटेक पूरा हो गया, और कहानी अधूरी रह गयी. लेकिन आशीष ये बात छिपा गये कि कैसे वो उस कन्या के पीछे पीछे गर्ल्स हास्टल के चक्कर लगाते रहे थे, और एक दो बार तो आइआइटी गेट पर अम्बी के मसाला डोसे भी खिलाने ले गये थे. तब के रैडरोज और आज के कैम्पस रैस्टोरन्ट के वेटरो ने हमे खुल के बताया कि कैसे आशीष भाई उस सुन्दरी को स्पेशल काफी पिलाने के बहाने घन्टो यहाँ बैठकर बतियाते रहते थे.और आज भी उसका नाम इन्टरनैट की गली गली मे ढूँढते फिरते है…..और आशीष भाई नर्सरी की सुनसान रोड वाली बात तो पूरी पूरी गोल कर गये….. खैर अब जाने भी दो…..इन्होने जितना लिखा है हम तो उतनी ही समीक्षा करेंगे ….है ना आशीष भाई?
उसके बाद शमा रोशन की हमारे रमन भाई ने अपनी बात से, इन्होने अपने अरैन्जड लव के बारे मे बताया
“कालेज की पढ़ाई ख़त्म होने के बाद मैं नया नया बंबई पहुँचा था .. जल्द ही मुझे एक अच्छी नौकरी मिल गई .. हम लोगों का २०-२५ trainees का एक ग्रुप था .. इसमें ४-५ लड़कियां भी थीं .. मैं इनमें से एक लड़की संजना को मन ही मन चाहने लगा और उससे मेलजोल बढ़ाने की कोशिश करने लगा लेकिन संजना ने उल्टा मुझसे दूरी बनाना शुरु कर दी, शायद उसे ऐसा लगता था कि मैं सिर्फ़ उसे पटाना चाहता हूँ”
अभी ये कुछ लिखने जा ही रहे थे, फिर इनको लगा कि छोड़ो यार, कोई पंगा ना हो जाये, फिर इन्होने अपना ट्रैक बदला और वापस गाड़ी मोड़ दी अपने अरैन्ज्ड लव के मामले पर
“मैंने अपनी भावी पत्नि से १०-१५ मिनट तक बात की. मेरे सामने बैठी हुई लड़की मुझे हर तरह से अच्छी लग रही थी और मैं मन ही मन फूला नहीं समा रहा था. जल्द ही हमारा रिश्ता तय हो गया. इसके बाद शुरु हुआ हमारा अरेंज्ड लव. रोज़ रात को देर देर तक हम लोगों की फोन पर बातें होती थीं. आफ़िस में मेरा मन नहीं लगता था और अपनी मंगेतर का ख़ूबसूरत चेहरा सपनों में नज़र आता था. अक्सर वीकेन्ड पर हम लोग बाहर जाते थे और होता था साथ में घूमना, पिक्चर देखना और रेस्तरां में प्यार भरी बातें करना. सोते जागते हर पल मेरे दिमाग में मेरी मंगेतर की तस्वीर रहती थी.”
बात यंही पर खत्म नही होती, इनका लांग डिस्टेनस प्यार लन्दन से भी जारी रहा, और बेचारे बढते बिल सें थोड़े हैरान परेशान रहे, लेकिन बाद मे सब ठीक हो गया..
इसके बाद आये हमारे ईस्वामी, इन्होने एक हिन्दी लिखने वाला टूल बनाया है, और मेरे ख्याल से ऐसा कोई ब्लाग नही छोड़ा है जहाँ पर इन्होने अपने टूल का पब्लिक रिलेशन आफिस ना खोला हो. कोई कुछ भी कहे, कुछ भी पूछे, ये शुरु हो जाते है अपने टूल को लेकर,वैसा इनका ठेलू स्किल बहुत अच्छा है,इसके अलावा ये लिखते भी बहुत झकास है.इन्होने पहले प्यार के बार मे एक कविता लिखी है, मेरे ख्याल से जिसका शीर्षक होना चाहिये ” लोटा,लव और लफड़ा” आप भी नोश फरमाइये..
इक गाँव की गोरी से प्रीत कर बैठे,उल्टी हम जीवन की हर रीत कर बैठे
लोटा ले के जंगल जाते थे अल-सुबह,इक झाडी में उसको देखा, दो ईंट पर बैठे
शर्माई वो घबराई ताम्र लोट लुढकाई,हम अपना लोटा दे के, बस पीठ कर बैठे
मिली लौटा लौटाने हिया लोटे लगाने,जम्माल-घोटा पी के हम नींद कर बैठे
खिली प्रेम कि फ़ुल्वारी सोन खाद डारी,एक ही झाडी में ज़रा दूर दूर बैठे.
बाद मे प्रेमिका का घर मे दिशा मैदान का प्रबन्ध हो गया सो लोटा लव बन्द, प्रेमिका का ठेकेदार से विवाह, कहानी का दर्दनाक अन्त.
ईस्वामी जी ने “जंगल, झाडी का स्थान, जम्माल-घोटे कि मात्रा, लोटे का आकार प्रकार जैसे व्यक्तिगत प्रश्नों के उत्तर न देने का फैसला किया है” लेकिन यदि आप इनके टूल का प्रयोग करके सवाल पूछेंगे तो ये ना नही कर पायेंगे.
इस बीच हमारे चिट्ठी पत्री का कुछ असर हुआ या अतुल भाई की टिप्पणी का, अपने रवि शंकर भाई भी अपने पहले प्यार की पहली चिट्ठी लेकर हाजिर हुए, रवि भाई ने ढूंढ कर चिट्ठी भेजी है,
… तेरी उस समय की सूरत मेरी नज़रों में कौंध जाती थी, जब मैंने तेरे चेहरे को
अपने हाथों में थामा था और तेरे होंठ लरज़ रहे थे और तब उनकी थिरकन को अपने
होठों से मैंने शान्त करने की कोशिश की थी.और पता है अभी तेरी कौन सी सूरत मेरी आंखों में कौंध रही है? ज़रा कोशिश
करो… नहीं जमा… मोहतरमा तेरी वही सूरत घूम रही है मेरे इर्द गिर्द जब तूने
बहाना किया था साथ नहीं आने का. सोचता हूँ तेरी इस बेइमानी का बदला किस तरह से
लूँ. तुझसे पूछूंगा तो ज़रूर मगर सज़ा ज़रूर अपनी मर्जी से दूंगा, बहरहाल अभी
इतना तो कह ही सकता हूँ कि – रीयली! शी इज़ इन लव.
पहला वाला पैरा तो पूरा पूरा समझ मे आया….लरजना,थिरकना फिर शान्त करना
————————X—–X—-X—– सेन्सर बोर्ड का दखल —–X—–X—-X—————-
दूसरे पैराग्राफ मे शिकवे शिकायते हो रही है…..बातो बातो मे देख लेने की धमकी दी जा रही है.खैर साहब रवि भाई को बहुत बहुत बधाइयाँ क्योंकि उनका पहला प्यार उनकी पत्नी ही है, हम लोगो की तरह नही. अब रवि भाई सच कह रहे है या नही…मै इसके चक्कर मे नही पड़ना चाहता.
इसके बाद बारी थी, फुरसतिया जी की… जो प्लेटफार्म पर गाड़ी जाने के दो दिन बाद आये.
फुरसतिया जी का मानना है कि प्रेम एक सुखद अहसास नही है, क्यों? क्योकि लैला मजनू, शीरी फरहाद वगैरहा का प्रेम सुखद नही रहा.हमारे फुरसतिया जी ने भी प्रेम कैमिस्ट्री पर प्रकाश डाला है, जरा नजर डालें.
“प्यार एक आग है.इस आग का त्रिभुज तीन भुजाओं से मुकम्मल होता है. जलने के लिये पदार्थ (प्रेमीजीव), जलने के लिये न्यूनतम तापमान(उमर,अहमकपना) तथा आक्सीजन(वातावरण,मौका,साथ) किसी भी एक तत्व के हट जाने पर यह आग बुझ जाती है.
फिर अपने जमाने की बात छेड़ दी….
हमारे बैच में तीन सौ लोग थे.लड़कियां कुल जमा छह थी.तो हमारे हिस्से में आयी 1/50.हम संतोषी जीव . संतोष कर गये.पर कुछ दिन में ही हमें तगड़ा झटका लगा.हमारे सीनियर बैच में लड़कियां कम थीं.तो तय किया गया लड़कियों का समान वितरण होगा.तो कालेज की 10 लड़कियां 1200 लड़कों में बंट गयीं.बराबर-बराबर.हमारे हिस्से आयी 1/120 लड़की .इतने में कोई कैसे प्यार कर सकता है?बकौल राजेश नंगा क्या नहाये क्या निचोड़े. संसाधनो की कमी का रोना रोकर काम रोका जा सकता था. पर कुछ कर्मठ लोग थे.हिम्मत हारने के बजाये संभावनायें तलासी गयीं.तय हुआ कि किसी लड़की से टुकड़ों-टुकड़ों में (किस्तों में)तो प्यार किया जा सकता है.अब कोई भी बालक किसी भी कन्या का चुनाव करके अपनी कहानी लिखा सकता था.ब्लागस्पाट का टेम्पलेट हो गयीं कन्यायें.
अभी इस विषय का अगला अध्याय लिखना बाकी है, लगे रहो फुरसतिया जी, टनाटन.
समय और जगह के अभाव मे फुरसतिया जी के लम्बे लेख पर ज्यादा टीका टिप्पणी नही की जा सकी, जगह मिलने पर पास दिया जायेगा.
अब बारी थी अपने देबाशीष भाई की… जिनको पहले प्यार की याद छुट्टियों मे ही आती है, मतलब? अब ये मै क्या बताऊ आप उन्ही से पूछिये.इन्होने अपनी प्रविष्टि मे एक कविता लिख भेजी है, आप भी सुनिये
मित्र मान लो, प्रिये मुझे मित्र मान लो!
मित्र मान लो, प्रिये मुझे मित्र मान लो!याद आता है समां वो जब हुआ था रुबरु,
दिल ने तभी था चाहा कि हो दोस्ती शुरु,
बुज़दिल था मैं जो कह न पाया, यही मान लो,
मित्र मान लो, प्रिये मुझे मित्र मान लो!कितने किये इशारे पर रही तू बेखब़र,
थे अरमां अपने कबसे बने तू हमसफ़र,
आसां न रहा लिखना प्रेमपत्र जान लो,
मित्र मान लो, प्रिये मुझे मित्र मान लो!तेरे सलोने रूप में खोया हुँ मैं सदा,
उन्मुक्त सी हँसी तेरी जाती है गुदगुदा,
रह न पाऊँगा तेरे बिन इतना जान लो,
मित्र मान लो, प्रिये मुझे मित्र मान लो!चेहरा तेरा निर्दोष है मासूमियत भरा,
हिरणी सी आँखों में हो जैसे भरी सुरा,
अनुराग मेरा तुमसे है पवित्र जान लो।
मित्र मान लो, प्रिये मुझे मित्र मान लो!मित्र मान लो, प्रिये मुझे मित्र मान लो!
मित्र मान लो, प्रिये मुझे मित्र मान लो!
कालेज के दिनो मे देबाशीष जी कान्ट्रेक्ट कवि हुआ करते थे, लोग बाग इस कविता पाठ के बदले मे उन्हे चाय समोसे खिलाते थे.इस कविता मे प्रेमी काफी संयत स्वर मे मित्रता की गुजारिश करता है, यानि कि अंगुली तो पकड़ाओ, पाहुँचा मै खुद पकड़ लूँगा. अब देबाशीष जी कितनी अंगुलिया पकड़ पाये और कितने पाहुँचो तक पहुँचे, ये तो वही बता पायेंगे. लेकिन भाभी जी छुट्टियों मे देबाशीष जी का ध्यान जरूर रखियेगा, क्या पता फिर कविता पाठ और फिर वहीं अंगुली…..
और अन्त मे हमारी पहले प्यार की कथा….आपबीती तो आप पढ चुके है, दोबारा बताकर फिर बोर नही करूंगा.बस एक शेर नोश फरमाये
जाते जाते वो मुझे अच्छी निशानी दे गया,
उम्र भर दोहराऊगा ऐसी कहानी दे गया
खैर मै प्यासा रह गया,पर उसने इतना तो किया
मेरी पलको की कतारो को वो पानी दे गया.
तो जनाब ये थी महफिले अनुगूँज, जिन चिट्ठाकारो ने इस अनुगूँज मे भाग लिया उनका धन्यवाद और जिन्होने नही भाग लिया उनका भी धन्यवाद, क्योंकि वो जो बहाने बतायेंगे, उनसे हम किसी ना किसी तरह से लाभान्वित तो होंगे ही.
अगली अनुगूँज का आयोजन भाई रोहित गुप्ता कर रहे है.
अब कुछ शब्द अपने चिटठाकार भाई लोगो के लिये.
अनुगूँज के बारे मे तो इतना ही कहा जा सकता है कि लोग बिछड़ते गये ज्यों ज्यों काफिला आगे बढा…..
मैने जितना सोचा था उतने लोगो ने इस आयोजन मे भाग नही लिया, मेरे ख्याल से अब गाय या पोस्टमैन पर निबन्ध लिखवाना पड़ेगा, अगले अनुगूँज मे.पोस्टमैन के निबन्ध पर याद आया, कि अपना दोस्त सुखविन्दर पढाई मे बहुत कमजोर था, अंग्रेजी मे तो उसकी पूरी की पूरी फीस ही माफ थी. हम लोगो ने किसी तरह उसको गाय पर निबन्ध तैयार करवाया था, जो सुक्खी ने पूरा रट्टा मारकर दिमाग मे बिठा लिया था.लेकिन मार पड़े पेपर बनाने वालों को इन्होने सुक्खी के साथ नाइन्साफी करके, गाय पर निबन्ध न देकर पोस्टमैन पर निबन्ध लिखने को दिया. अब सुक्खी तो सुक्खी ,निबन्ध कहाँ से लिखता,उसने पोस्टमैन पर निबन्ध लिख मारा, बस जहाँ जहाँ COW का शब्द था वहाँ वहाँ POSTMAN लिख मारा. निबन्ध भी पढने लायक था. एक्जामिनर तो हँस हँस के पागल हो रहा था.
लेकिन अपने बाकी के चिट्ठाकार तो सुक्खी से भी गये गुजरे है, अरे भाई, गलत सलत कुछ भी लिख देते….कोई हम वैरीफाइ थोड़े ही करने गये थे.कम से कम हमारी नाराजगी तो ना झेलनी पड़ती……………………………………अब झेलना महीने भर गजलें.
Filed under: अनुगूँज

अनुगूँज यानि सभी चिट्ठाकारों की किसी भी विषय पर सम्मिलित आवाज। अनुगूँज के पाक्षिक आयोजन में आयोजक चिट्ठाकार एक विषय देता है जिस पर सभी भाग लेने वाले चिट्ठाकार अपनी प्रविष्टि लिखते है। जी हाँ कुछ कुछ निबन्ध प्रतियोगिता की तरह, बस इसमे आपको अपनी कलात्मकता (जो नि:सन्देह आपके पास है) का मिश्रण करते हुए अपनी पोस्ट अपने ब्लॉग पर लिखनी है।
अनुगूँज की समाप्ति के अवसर पर आयोजक चिट्ठाकार, सभी प्रविष्टियों का उल्लेख करते हुए एक लेख अक्षरग्राम पर लिखता है। अनुगूँज सम्बंधित नियम 




सरजी आपने जोश जगा दिया है, वादाखिलाफी के लिए तो मैं बदनाम रहा हूँ, आप शामिल न करें फिर भी अपनी दास्तां बता कर रहूंगा, बस संक्रांति कि छुट्टी आने दें।
भाई मैं सच ही कह रहा हूँ. हम लोग कक्षा आठवीं से साथ ही साथ एक ही स्कूल में पढ़े हैं. और पहला प्यार मेरे खयाल से उसी दौरान परवान चढ़ता है. मैं उत्तर भारतीय और मेरी प्रेमिका दक्षिण भारतीय. हमने भी समाज से , परिवार से खूब लड़ाईयाँ लड़ीं….
और अब आपस में झगड़ते हैं….
इससे तो अच्छा होता कि पहले प्यार की यादें ही बचतीं… साथ में जीवन बिताने नहीं आती वो…
हेहेहे… अब आखिरी पैरा जरा सा झूठ है
–रवि
भैया जी, जितना लिखा है उतने में ही संतोष कर लो ना। अरे यार अगर चाय ही पिला दी होती तो फिर मुश्किल किस बात की थी, हम तो उतने में ही संतोष कर लेते।
[…] ँ से यहाँ तक कैसे पहुँचे, यह तो शायद पिछली अनुगूँज में कहना चाहिए था पर.. दिल […]
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great reallocate?howls periodical.
[…] हिंदी चिट्ठाजगत के शुरुआती दौर में देबाशीष ने कई शुरुआतें की ताकि लोगों में लिखने की ललक बनी रहे। उनमें से अनुगूंज सबसे प्रमुख है। मेरी समझ में नये साथियों को हिंदी ब्लागजगत के शुरुआती दौर के सबसे बेहतरीन लेख अगर देखने हों तो उनको अनुगूंज के पुराने अंक देखने चाहिये। अनुगूंज में कोई एक आयोजक चिट्ठाकार विषय देता था। लोग उस विषय पर लिखते थे। फिर आयोजक चिट्ठाकार उन लेखों की समीक्षानुमा प्रस्तुति (अवलोकनी चिट्ठा)अक्षरग्राम पर करता था। सबसे पहली अनुगूंज का विषय था- क्या देह ही है सब कुछ। इसी आयोजन के बहाने हमें देबाशीष ने‘हुकअप’ संबंधों के बारे बताया। अनुगूंज के बहाने ही तमाम लोगों ने झिझकते, शरमाते, मुस्काते, खिलखिलाते हुये अपनेपहले प्यार के किस्से सुनाये। […]
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