तुझे मिर्ची लगी तो मैं क्या करूँ?

मेरे कई दोस्तों, परिचितों ने मेरे ब्लाग से संबधित ईमेल या तो डिलीट कर दिये हैं या अजीब बेवकूफियत भरे सवाल किये शुरूआती दिनों में| चलो माना यूनिकोड की जानकारी नही है, पर अच्छा भला अंग्रेजी में लिखा लिंक Why I can’t see hindi text अगर आँख के अँधो को न दिखे तो क्या करूँ? कईयों ने पूछा कि तू यह सब क्यो लिखता है, कौन पड़ता है यह सब? मन में सवाल आता है कि जो कंप्यूटर विशेषज्ञ इतने जटिल प्रोग्राम लिख लेते हैं, पाईरेसी के लिऐ दुनिया जहान की साईट खंगाल लेते हैं, एक टुच्चा सा फोंट डाऊनलोड करने में उनकी नानी क्यों याद आती है| मन में सवाल बना रहा कि मैं वाकई किसके लिऐ लिख रहा हूँ? फिर अवतरण हुआ भारतीय ब्लाग मेला का| सच मानिए तो भारतीय ब्लाग मेला किस चिड़िया का नाम है मुझे पता नही था| देवाषीश बाबू ने मेरा एनआरआई टेस्ट वहाँ भेजकर इस संसार से हम सबको परिचित कराया| इसके बाद तो हिंदी छा गई भारतीय ब्लाग मेला पर| मुझे भी कई प्रतिभाशाली चिठ्ठाकारों का पता चला ईसके द्वारा, और यह संतोष भी हुआ कि हिंदी चिठ्ठाकारों के अलावा भी कोई पड़ेगा ईन चिठ्ठो को | पर अब ब्लागमेला के आयोजकों को भी कष्ट हो रहा है| बाकि कोई कुछ भी कहे, मैंने सोच लिया है कि मैं न तो अंग्रेजीदां बाबूओं के ब्लाग पर जाकर कोई कमेंट करूँगा न ही मैकालेपुत्रों के अगले मेला संस्करण में भाग लेने वाला हूँ| वैसे आलोक भाई ने शायद कभी ऐसी ही राय रखी थी कि हम खुद अपने ही ब्लाग मेला और अपने ही हिंदी ब्लागमंडल पुरस्कार शुरू करें| खैर ब्लागजीन एक बार विधिवत शुरू हो गया तो हिंदी के जंगल में आग फैलते देर नहीं लगने वाली| लगे हाथ मेरी छठी ईंद्रीय क्या कह रही है वह भी बक देता हूँ नही तो अनूप जी कहेंगे देर लगा दी बात कहने में| awards for the 2004 Indibloggies जिसे १२००० से ज्यादा बार देखा गया है , माना जा सकता है कि स्रवाधिक लोकप्रिय ब्लाग होगा| शायद ही कोई किस्मत का धनी हिंदुस्तानी ब्लागर हो जिसे ईसका पता न हो| इस बार वहाँ कुल जमा ११ ज्यूरी है जिनमे अपने दो प्यारे हिंदी भाषी दोस्त भी हैं| इन दोनो ने तो ईंडिक ब्लाग की श्रेणी में नामांकन किये हैं पर बाकि नौ महानुभावो को ऐसा कोई शौक नहीं लगता कि वे किसी भारतीय भाषा के नामांकन करें| मैनें बाकि लोगो की साईट पर जाकर नामांकन देखे पर मुझे उन सबकी दिलचस्पी भारतीय भाषायों को छोड़ हर क्षेत्र में लगी| अगर मेरा अंदाज गलत नहीं निकला तो यह पुरस्कार हिंदी की झोली में गिरने की संभावना दिखती है| सच कहूँ तो यह एक यक्ष प्रश्न है कि हर भाषा का ज्यूरी जुटाना मुश्किल होता, पर इतने सारे मराठी और तमिल ब्लाग हैं पर एक भी ज्यूरी नहीं| ऐसे में पुरस्कार हिंदी वाले ले गये तो डा. महीप सिंह का कहना सही लगता है|

आखिर में एक बात और जोड़ दूँ, अपनी इस टीस को सिर्फ हिंदी ब्लाग लेखकों में बाँटना चाहता था ईसलिए अक्षरग्राम पर लिखा| रोजनामचा पर यह लेख देख कर कितने दोस्त दुश्मन बनेंगे कह नहीं सकता|

21 Responses to “तुझे मिर्ची लगी तो मैं क्या करूँ?”

  1. You are very right as far as language Jury are concerned, still people did nominate blogs for Indic langauge categories (remember that there are separate categories for all Indian languages, depends on nominations). I personally am not aware of Marathi blogs apart from the 2 I know Mee Maza and Paulvat (of Nirav). Yes there are a lot of Tamil and Telugu blogs and I hope you would see a decent lot of nominations on these languages (and also Malayalam).

    No need to get disappointed by the mela thing. We can continue participating there and I hope day will be when even other language posts would be nominated. Why don’t you volunteer to host the mela sometime at Rojnamcha and pioneer that.

  2. अतुल, अगर कोई अन्य भाषा वाला व्यक्ति या ब्लाग , हिंदी चिठ्ठों को जगह देता है तो ये अच्छी बात है,लेकिन हम किसी पर दबाव नहीं डाल सकते.चाहे जिस भी कारण से हो , अभी भारतीय ब्लाग संसार में अंग्रेजी का ही वर्चस्व है.जहाँ तक हिंदी लिखने पढने की बात है, अन्य भाषा वालों को क्या दोष दें? कई चिठ्ठाकार हैं, जिनकी मातृभाषा हिंदी है , लेकिन वो हिंदी में नहीं लिखते हैं.और कितने लोग हैं जो मातृभाषा हिंदी होने के बाद भी,हिंदी पढते हैं?
    हम लोगों ने थोड़ी देर से शुरूआत की है,लेकिन जिस तरह से “अक्षरग्राम”,”चिठ्ठा विश्व” पर काम हुआ है, हिंदी चिठ्ठों पर ज्यादा लोगों का ध्यान जरूर आकर्षित होगा.

  3. जब अन्यथा हिन्दी भाषी कंप्यूटर प्रयोक्ता अपने कंप्यूटर पर हिन्दी पढ़ने के लिए थोड़ी सी भी ज़हमत नहीं लेना चाहते, तो कोफ्त तो होती है भाई। हिन्दी लिखने की तो बात ही मत कीजिए। अभी पिछले दिनों किसी को लखनऊ में ब्लाग का लिंक भेजा तो लिखते हैं हम ने साइबर कैफे में देखा तो सिर्फ बक्से नज़र आए। अब साइबर कैफे में फाँट डाउनलोड कौन करे। अगर लखनऊ के साइबर कैफे में हिन्दी का यह हाल है तो किसी अहिन्दी-भाषी क्षेत्र में क्या होगा। शायद तब तक तक़लीफ रहेगी जब तक सभी कंप्यूटरों में नए ऑपरेटिंग सिस्टम नहीं आते। फिर भी मानना पड़ेगा पिछले साल दो साल में जो प्रगति हुई है, वह है तो सराहनीय।

    पिछले दो तीन दिन से अक्षरग्राम का मुख्यपृष्ठ मेरे कंप्यूटर पर ठीक से नहीं दिखता। हेडर, फुटर, साइडबार सब ग़ायब है और ऊपर नीचे error messages हैं। टिप्पणी पृष्ठ जो कुब्रिक में है, ठीक दिखता है। शायद डिफॉल्ट टेंपलेट में कोई समस्या है।

  4. मिर्ची लगने पर सी-सी(देखो-देखो,वह-वह)करके पानी पीना चाहिये. वैसे देखें यह दवा फायदा करे शायद.

  5. मिर्ची लगने पर सी-सी(देखो-देखो,वह-वह)करके पानी पीना चाहिये. वैसे देखें यह दवा फायदा करे शायद.

  6. अजी छोडिए, ३ दिन से अपने ब्लाग पर मैंने निवेदन पेल रखा है, चिट्ठा-विश्व पर दिख रहा है, सारे सदस्य आते हैं वहां. किसी से मेरे निवेदन के जवाब में २ लाईन नही लिखी गई, बातें करवा लो और नेतागिरी झडवा लो.

    जब देखो हिन्दी ना पढे जाने का स्यापा करते हैं. ऐसे नही होगा, जब तक आपकी माताजी आपकी धर्म-पत्नी को हिन्दी मे अचार बनाने की विधी पीसी से हिंदी मे ना भेज सकें ये सारी ब्लागबाजी व्यर्थ है. पहले तकनीक आसान करो और जनजन तक फ़ोकट में पहुंचाओ - क्या समझे? मैं एक इन्जीनियर पहले हूँ ब्लागर बाद में, आप ये सब पेल पा रहे हैं क्योंकी थोडा बहुत कम्प्यूटर का इस्तेमाल जानते हैं फ़िर पचास पन्ने की डोक्युमेंट बनाने के बजाए ५० लाईन का कोड क्यों नही लिखते? एक से एक अति-रथी महारथी लोग हैं आप! अभी सच बोला है - सब की सुलग लेगी!

    देसी मानसिकता से उबरो ज्यादा रिकगनेशन और महिमामंडन के चक्कर में रहने के बजाए हिन्दी का इन्टर्नेट पे मूलभूत ढाँचा मजबूत करो - काम करना है या ये जनाना किट्टी पार्टियां ही चलेंगी? जैसे महिलाएं एक दूसरे की साडियो की तारीफ़ करती हैं क्या हम वैसे ही एक दूसरे के ब्लोग्स की तरीफ़ ही करते रहेंगे या अपने ब्लाग्स को भडास टाईम्स बनाए रक्खेंगे? बताईए?? और ये कतई मत समझना की सडा सा टूल बना के ईतरा रहा हूं या अपने ब्लोग पर जावाब लिखवान चाह रिया हूं, अपन उस लाईन के आदमी ही नही हैं - पर अपने की-बोर्ड की कसम खा के कहता हूं पुरूस्कार और सम्मान से बडा कोई मेनिपुलेशन नही है रचनात्मकता की राह के रोडे है. ये प्रविष्ठियां गोष्ठियाँ ज्युरियाँ बडी दयनीय चीजें हैं रीयल सोल्युशन्स के आगे! अब होने दो दिवालियाँ, गन-पाउडर मेरे से ले जाना!! ;-)

  7. भाई आप लोग निवेदन की पेल के बदले में जवाब का प्रतिपेल क्यों नहीं करते हैं. फुरसतिया उधर लिखते हैं ‘अलबर्ट पिंटो के गुस्से’ के बारे बाकी गुस्सों को इग्नोर करते हुए. तो अच्छा - खासा स्वामी से सुनामी बन ही जायेगा. (ज़माने ने जैसे कल्लू को कालिया बना दिया था )

    काशीनाथ सिंह के बनारस के संस्मरण याद आ गये जिसमें बनारस के कवि कहते हैं - ‘गुरू कल रात एक कविता पेले हैं, तो आओ पहले चाय लड़ जाय’
    तो आइये ब्लागर जन! ब्लाग लड़ जाय इनके निवेदन के जवाब के लिये.
    वैसे दुर्वासा मुनि से यह कहने में तो हिया कांप रहा है कि कुछ भी कहो, आपने टिप्पणी में भड़ास अच्छी पेली है (तारीफ करने के लिये फिर माफी और यहीं पर हम रुकते हैं क्योंकि आपका टूल तो हमने यूज नहीं किया सो उसपर टिप्पणी करने का आपका सर्वाधिकार सुरक्षित है )
    वैसे इस डायलाग में (”काम करना है या ये जनाना किट्टी पार्टियां ही चलेंगी”) में दम है. राजपूतानियाँ अपने कायर पतियों को युद्ध में जाने के लिये इसी तरह उकसाती थीं और फिर राजपुत्रों की मर्दानगी हुसड़ कर बाहर कूद पड़ती थी.

  8. तुम्हारी संगणक की पढ़ाई-लिखाई कब काम आयेगी आर्यपुत्र ठेलुहानरेश?

  9. देखो भइया, इस्वामी की बात कड़वी भले ही हो, लेकिन बात मे कुछ दम जरूर है.
    लेकिन भइया, हिन्दी को अभी इन्टरनेट पर आये हुए बक्त ही कितना हुआ है, थोड़ा समय लगेगा. लेकिन भइया मूलभूत ढांचा तो तैयार करना ही पड़ेगा…

    सो भाई लोगो, अपने गुस्से को थूको और दिमाग को दुरुस्त करो……कमर कसो और अपने हिन्दी ब्लाग को जन जन तक पहुँचाओ…. तरीके अपने अपने हो सकते है. हमारे सिन्धियों मे कहाँ जाता है, पड़ोसी दुकानदार को कोसने के बजाय,अपनी दुकान का माल और डिस्पले ऐसा रखो कि ग्राहक तुम्हारी दुकान मे घुसे बगैर ना रह सके.,माल सस्ता और अच्छा होगा तो ग्राहक जरूर खरीदेगा….और अगर प्रतिस्पर्धा नही कर सकते तो दुकान मे ताला लगाकर घर मे बैठो.

    देबाशीष भाई, आप अंग्रेजी ब्लागर दोस्तो से बैनर एक्सचेन्ज प्रोग्राम सैट करो…..बकिया हम देखते है इधर से. जिन जिन भाई लोगो ने अपना पन्ना गूगल भइया को सबमिट नही किया है, तुरन्त कर दें. और हमारी दूसरी मेल का इन्तजार करें.

  10. आर्यपुत्रों और आर्यपुत्रियों,
    मैंने नहीं सोचा था कि हम लोग एक दिन इतने अधिक हो जाएँगे कि युद्ध की दुन्दुभी बजा पाएँगे। वाह! मज़ा आ गया। बहुत ख़ुशी हुई। इसलिए, कि मरे हुए कुत्ते को कोई लात नहीं मारता है, केवल जीवन्त और भौंकने वाले जोशीले कुत्तों से ही लोग चिढ़ते हैं, क्योंकि उन्हें खतरा महसूस होता है। ( खतरे में ख होता है या ख़?) अतुल जी, पेले रहिए। आपका चिट्ठा मैंने पहली बार देखा था, तो लगा था कि वाह, किसी लिखने वाले ने लिखना शुरू किया है, मेरे जैसे जोड़ तोड़ के लेखक ने नहीं। उसके बाद मुझे याद आया कि कैसे कुकरमुत्ते की तरह हिन्दी के चिट्टे पैदा हुए थे। अब और पैदा होंगे तो युद्ध तो होगा ही। यह भी सम्भव है कि कुकुरमुत्तों का आपस में भी युद्ध हो। सबके विचार एक से नहीं होते हैं। पर लिखते रहना चाहिए। वही ज़रूरी है। सभ्य लोग कलम से वार करते हैं, हाथ से नहीं। जाल पर तो आपको कोई हाथ लगा नहीं सकता है। और युद्ध ग़लत दिशा में नहीं जाए। अपनी रचनात्मकता और अनोखापन न खोएँ, युद्ध की तपती हुई अग्नि में झुलस न जाएँ। ब्रह्मास्त्र बचा के रखें। अभी हमें और आगे जाना है। अपने ओज की तपती अग्नि से शत्रुओं का नाश करें, अपना नहीं। जिस दिन सभी भाषाओं के स्थलों की सङ्ख्या
    उन्हें बोलने वाले लोगों की सङ्ख्या के अनुपात में हो जाएगी, उस दिन हम सभी चटखारे ले के ये पुरालेख पढ़ेंगे। और वह दिन हमारे जीवनकाल में ज़रूर आएगा।

  11. अतुल भाई ,

    आप लोग जो कर रहे हैं वह बदलने का काम है. यह काम बहुत साहसी तथा दूरदर्शी व्रिति के लोग कर सकते हैं. आपको याद होगा अजादि कि लदएे में कुछ लोग इसी तरह गान्धिजि के प्रयासों कि खिल्ली उड़ाते थे.

    आगे बढो. विजयि भव.

    shesh nath singh

  12. हमारे खयाल से आक्षेपों के भंवर में फंसने से अच्छा है कि हमारे संगणक भाषा ज्ञानी मित्र गण इस दिशा में कुछ प्रयास करें। हमसे भी जो सम्भव होगा हम करेंगे, सिवाय प्रोग्रामिंग के क्योंकि उसमें हमारा ज्ञान सीमित है। मिर्च जब लग ही गयी है तो क्यों न ऐसी मिठाई बनायी जाये कि सारी मिर्चों की आगे से कड़वाहट निकल जाये या पता ही न चले।

  13. rather lake to write in Hindi script, how to, Please.

  14. I mean to say rather like to write in Hindi script.

  15. [...] मिर्ची लगी तो मेरी भैंस को डंडा क्यों मारा? अतुल ने साल की शुरुआत गरमागरम की। वो मारा गुस्से का गुम्मा कि पागलों ने खिड़कियां बंद कर लीं। तुझे मिर्ची लगी तो मैं क्या करूं लिखकर अतुल ने सारे हिंदी चिट्ठाकारों को हिलाकर परेशान कर दिया। इसके कुछ मजेदार असर हुये। चिट्ठाचर्चा शुरू हुआ। नयी योजनाओं की सुगबुगाहट हुयी। [...]

  16. [...] अतुल ने साल की शुरुआत गरमागरम की। वो मारा गुस्से का गुम्मा कि पागलों ने खिड़कियां बंद कर लीं। तुझे मिर्ची लगी तो मैं क्या करूं लिखकर अतुल ने सारे हिंदी चिट्ठाकारों को हिलाकर परेशान कर दिया। इसके कुछ मजेदार असर हुये। चिट्ठाचर्चा शुरू हुआ। नयी योजनाओं की सुगबुगाहट हुयी। [...]

  17. [...] अँग्रेजी ब्लागजगत में एक आयोजन होता है भारतीय ब्लागमेला। जिसमें भारतीय भाषाओ की भागीदारिता हिंदी ब्लागजगत के भीष्म पितामह देबू के प्रयास से हुई। कुछ व्यापक सोच वाले अँग्रेजी ब्लागरो ने इस परंपरा को बढ़ाया पर कुछ काले अँग्रेज भी निकल आये। यदि कोई हिंदी पोस्ट न शामिल करे तो ठीक पर हिंदी पोस्टो को कैंची चलाने योग्य समझना और व्यर्थ के विरोध को बढ़ावा देने का खुल्लमखुला विरोध उन्हीं अमरीकी ब्लागरो ने किया था जिन्हे हिंदी ब्लागर के छद्म नाम वाले बँधु छिद्रान्वेषी समझते हैं। [...]

  18. [...] हमारे जीवन के हर पहलू की जानकारी हम डाल सकते हैं विकीपीडिया में। बहुत पहले स्वामीने एक डायलाग मारा था:- जब देखो हिन्दी ना पढे जाने का स्यापा करते हैं. ऐसे नही होगा, जब तक आपकी माताजी आपकी धर्म-पत्नी को हिन्दी मे अचार बनाने की विधी पीसी से हिंदी मे ना भेज सकें ये सारी ब्लागबाजी व्यर्थ है. पहले तकनीक आसान करो और जनजन तक फ़ोकट में पहुंचाओ - क्या समझे? [...]

  19. धन्य हैं हे आर्य पुत्रों आप लोग। आपकी मेहनत रंग लायी है। आज भी हिन्दी ब्लॉगजगत छोटा है पर आज उसकी इज्जत है। हाँ स्थिति आज भी है कि कई लोग जिनमें मेरे कई मित्र शामिल हैं आज भी हिन्दीजगत से कतराते हैं। इस बारे में ई-स्वामी के विचारों से घनघोर सहमत हूँ। उनके विचार आज के समय में भी सार्थक (Significant कहना चाह रहा था ठीक शब्द नहीं सूझ रहा) हैं।

    (टाइम मशीन में भविष्य से आया हूँ, अक्षरग्राम-भ्रमण पर हूँ) :)

  20. [...] ब्लागिंग मेरे लिये शुरू में अभिव्यक्ति का माध्यम बनी। अपना सारा पहले का लिखा कूड़ा कबाड़ हमने अपने ब्लाग पर डाल दिया, डालते गये। अनुगूंज शुरुआती दिनों में अभिव्यक्ति का अच्छा माध्यम बना। अनुगूंज के जरिये हमने कुछ नये लेख बहुत मन लगाकर लिखे। उनमें मेरा सबसे पहला लेख -क्या देह ही है सब कुछ मुझे अभी भी लुभाता है। अनुगूंज की दुबारा अविलम्ब शुरुआत होनी चाहिये। अनुगूंज के साथ ही हम लोग उन दिनों अंग्रेजी ब्लागरों द्वारा आयोजित ‘ भारतीय ब्लाग मेला‘ प्रतियोगिता में भी कुछ दिन उचक-उचक कर हिंदी के ब्लाग नामांकित किये। एक बार जब हिंदी के कई ब्लाग वहां चर्चित हुये तो अतुल की ‘डांसिग-मेल’ आयी- हिंदी ब्लाग मेला में छा गयी। उसमें होना-हवाना कुछ नहीं था लेकिन कुछ चर्चा होती थी हम उसी में निहाल हो जाते थे। एकाध बार अतुल, जीतेन्द्र से पंगा हुआ। कुछ लोगों ने अपने ब्लाग में कलाकारी पूर्ण फोटो लगाये उसको अतुल और जीतेंन्द्र ने करमचंद जासूस बनकर फ्राड बताया। फिर बाद में उन लोगों ने हम लोगों के ब्लाग की चर्चा बन्द कर दी। इसपर बड़ा वबाल हुआ। हम सब लोगों ने मैडमैन नामक ब्लागर के यहां इतनी टिप्पणियां कीं कि बेचारा पगला गया और उसने अपने ब्लाग पर कमेंट बन्द कर दिये। फिर उसी समय अक्षरग्राम पर तमामबहसे हुयीं। निरंतर का प्रकाशन शुरू हुआ। उसी समय चिट्ठाचर्चा शुरू किया गया। चिट्ठाचर्चा शुरू करने के पीछे ‘ब्लाग मेला’ में कुछ अंग्रेजी ब्लागरों द्वारा हिंदी ब्लाग से बिदकने के कारण अपना मंच बना था। वे हिंदी से बिदकते थे। हमने कहा हम दुनिया की किसी भी भाषा की चर्चा करेंगे। कुछ दिन इसे मैं अकेले लिखता रहा। अंग्रेजी ब्लाग्स के बारे में भी लिखने के कारण इसे वे भी पढ़ते थे। लेकिन समय के अभाव के कारण इसे बाद में स्थगित करना पड़ा। बाद में हमें अंदाजा लगा कि हमारा तरीका गलत था। फिर हमने अपने और साथियों से अनुरोध किया और अब मेरे ख्याल में चिट्ठाचर्चा हमारे ब्लाग जगत की एक उपलब्धि है। आगे मेरा मन है कि हम इसे इसके मोटो ‘दुनिया की किसी भी भाषा के चिट्ठे का चर्चा’ के अनुरूप बना सकें तो क्या कहने! [...]

  21. [...] अतुल अरोरा कनपुरिया होने के नाते बाई डिफ़ाल्ट शरारती हैं। इनकी रचनात्मकता के चरम क्षण वे होते हैं जब ये अपनी चिकाईबाजी के परममूड में होते हैं। आजकल न जाने कहां ये बिजी हैं कि न चिकाई करते हैं न लिखाई। बस जब कभी टोंका जाता है तो पिनपिनाते हुये कहते हैं -कमेंट तो करते हैं। ऐसे थोड़ी चलता है। देखो यहां दुनिया भर के फ़साद हो रहे हैं और तुमको मिर्ची ही नहीं लगती। क्या बात है भाई! [...]

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