सधन्यवाद बधाईयाँ!!

अनुगूँज का पहला आयोजन सार्थक रहा। इसकी सफलता के लिये तमाम प्रतिभागीयों को बधाईयाँ!! शिरकत करने वालों की संख्या ज़रा ज़्यादा होती तो और आनन्द आता पर मैं गालिब के इन विचारों का पुर्ण समर्थक हूँ कि

कुछ तो मजबुरीयाँ रही होंगी
युं ही कोई बेवफा नहीं होता

चलिये भाई ये तो हुआ कुछ मज़ाक, अब बात करें उनकी जिनके सहयोग से ये आयोजन सफल रहा -
देबाशीष ने अपनी कलम की धार ‘देह पर टिकी संस्कृति’ से व्यक्त की। आलेख के पुर्वार्ध में तो बेहद धुंआधार तरीके से अपनी व्यग्रता का इज़हार पैनी भाषा में किया। उनकी गुँजन कुछ इस तरह थी-

मुझे यह बात बड़ी हास्यास्पद लगती है कि राजनैतिक संप्रभुता पर गर्व करने वाले हम भारतीय अपनी सांस्कृतिक संप्रभुता कि रत्ती भर भी परवाह नहीं करते। …जिस सांस्कृतिक संप्रभुता को बचाने के लिए भूटान जैसे छोटे मुल्क कदम उठाने में नहीं झिझकते उसे हमने मुक्त बाजार और वैश्विक अर्थव्यवस्था के नाम पर सरेआम नीलाम कर दिया।

जितेंद्र जी ने अपने किंग साईज़ आलेख में इस बात पर प्रकाश डाला कि समाज के वे सभी हिस्से जिन पर ऊँगली उठाई जा सकती है अपने आप को बेदाग बताते है -

फिल्म वाले बोलते है, सिनेमा समाज का आईना है, नयी नयी एक्ट्रेस बोलती है, जब कुछ दिखाने को है तो क्यों ना दिखाऊ,मेरा जिस्म है, मेरी मर्जी, हर दूसरा स्टार अपने कपड़े उतारने को तैयार बैठा है, अब टीवी चैनल वालों से पूछो तो बोलते है, प्रोग्राम हम थोड़े ही बनाते है, जो प्रोडयूसर बनाते है वही दिखाते है, प्रोडयूसर बोलते है जो समाज मे घटित होता है उसी से प्रेरित होकर प्रोग्राम बनाते है, समाज से बात करों तो पानी पी पीकर टीवी वालों को गालिया देते है, अब मामला तो फिर वहीं पहुँच जाता है

पंकज ने देर आये, दुरुस्त आये की तर्ज़ पे शिरकत की। उनके छोटे किंतु सारगर्भित लेख में उन्होंने जीवन की सही शुरुआत को ही ज़रूरी माना -

पहले बच्चे जहाँ पंचतंत्र, जातक कथाएं व विवेकानंद पढ़ कर बड़े होते थे तो आज एम टी वी, जी टी वी, और स्टार टी वी देख कर बड़े होते हैं। तो इन सब माध्यमों का कुछ असर तो होगा ही।

नए चिट्ठाकार आशीष ने बड़े मार्मिक सत्य को उजागर किया यह कह कर कि -

यदि नैतिकता का सवाल है तो देह कुछ भी नहीं है, पर यदि बात मनोरंजन पर आती है तो देह काफ़ी ज़रूरी है। आदर्शवादियों के लिये देह कुछ नहीं है लेकिन एक वेश्या के लिये वो रोज़ीरोटी का साधन है।

खब्बू चिट्ठाकार अनूप ने हास्य का पुट देकर साबित करने का प्रयास किया कि -

कुछ नही है देह सिवा माध्यम के.सामान बेचने का माध्यम .उपभोक्तावाद का हथियार.उसकी अहमियत तभी तक है जब तक वह बिक्री में सक्षम है .जहां वह चुकी -वहां फिकी।

अंततः मेरे अपने चिट्ठे में मैंने ज़िक्र किया कि -

मनुष्य की चार्वाक दृष्टि ने कुछ नश्वर चीज़ों को अतिमहत्वपुर्ण बना दिया। जहाँ हमारे पुर्वज इस शरीर को परमार्थ साधने का एक साधन भर माना करते थे, वहीं उनके वंशज इसे सर्वोपरी महत्व देकर इसके इर्द-गिर्द ही जीवन का ताना बाना बुन रहे है।

आगे होने वाले आयोजनों के प्रति जनाब बशीर बद्र के अश आरों के माध्यम से अपनी शुभकामनायें व्यक्त करता हूँ कि

कभी दिन की धूप में झुम के, कभी शब के फुल को चुम के
युं ही साथ साथ चले सदा, कभी खत्म अपना सफर ना हो

अनुगूँज के दूसरे आयोजन का बीड़ा उठाया है पंकज ने। तो बस उनकी घोषणा की प्रतीक्षा कीजिए!

4 Responses to “सधन्यवाद बधाईयाँ!!”

  1. I am not able to view this Blog . I get no Devnagari script on the screen but squares.

    What should I do to view your blog properly?

  2. नीरव जी!
    “कुछ तो मजबुरीयाँ रही होंगी
    युं ही कोई बेवफा नहीं होता”
    यह गजल मिर्जा गालिब की नहीं बल्कि कुँवर बेचैन की है।
    कुपया इस ब्लॉग को दुरुस्त कर लें।

  3. […] पहला आयोजन, मेज़बान नीरव (१ नवंबर, २००४) […]

  4. […] हिंदी चिट्ठाजगत के शुरुआती दौर में देबाशीष ने कई शुरुआतें की ताकि लोगों में लिखने की ललक बनी रहे। उनमें से अनुगूंज सबसे प्रमुख है। मेरी समझ में नये साथियों को हिंदी ब्लागजगत के शुरुआती दौर के सबसे बेहतरीन लेख अगर देखने हों तो उनको अनुगूंज के पुराने अंक देखने चाहिये। अनुगूंज में कोई एक आयोजक चिट्ठाकार विषय देता था। लोग उस विषय पर लिखते थे। फिर आयोजक चिट्ठाकार उन लेखों की समीक्षानुमा प्रस्तुति (अवलोकनी चिट्ठा)अक्षरग्राम पर करता था। सबसे पहली अनुगूंज का विषय था- क्या देह ही है सब कुछ। इसी आयोजन के बहाने हमें देबाशीष ने‘हुकअप’ संबंधों के बारे बताया। अनुगूंज के बहाने ही तमाम लोगों ने झिझकते, शरमाते, मुस्काते, खिलखिलाते हुये अपनेपहले प्यार के किस्से सुनाये। […]

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